जीव जगत का वर्गीकरण
जीव जगत का वर्गीकरण — अध्ययन नोट्स
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जीव जगत का वर्गीकरण
व्याख्याजीव जगत का वर्गीकरण
जीव जगत अत्यंत विविधतापूर्ण है और पृथ्वी पर पाए जाने वाले जीवों की संख्या लाखों में है। इन जीवों की पहचान, अध्ययन और संरक्षण के लिए उन्हें व्यवस्थित रूप से वर्गीकृत करना आवश्यक है। प्रारंभिक काल में जीवों के वर्गीकरण के प्रयास सहज बुद्धि और सामान्य उपयोगिता के आधार पर किए गए थे। अरस्तू ने पादपों को वृक्ष, झाड़ी और शाक में तथा प्राणियों को लाल रक्त की उपस्थिति के आधार पर वर्गीकृत किया। लीनियस ने द्विजगत पद्धति विकसित की जिसमें जीवों को प्लांटी (पादप) और ऐनिमेलिया (प्राणी) जगत में बांटा गया। परंतु इस पद्धति में यूकैरियोटी और प्रोकैरियोटी, एककोशिकीय और बहुकोशिकीय तथा स्वपोषी और परपोषी जीवों के बीच भेद संभव नहीं था। इसलिए आधुनिक वर्गीकरण में कोशिका संरचना, पोषण की विधि, प्रजनन, और विकासीय संबंधों को भी शामिल किया गया है। सन् 1969 में आर.एच. व्हिटेकर ने पाँच जगत वर्गीकरण की पद्धति प्रस्तावित की जिसमें मौनेरा, प्रोटिस्टा, फंजाई, प्लांटी और एनिमेलिया जगत शामिल हैं। इस पद्धति में जीवों को उनके कोशिका प्रकार, पोषण, प्रजनन और अन्य लक्षणों के आधार पर वर्गीकृत किया गया है। यह वर्गीकरण जीवों की अधिक वैज्ञानिक और व्यवस्थित समझ प्रदान करता है।
- जीव जगत की विशाल विविधता को समझने के लिए वर्गीकरण आवश्यक है।
- अरस्तू ने सरल आकारिक लक्षणों पर आधारित वर्गीकरण किया।
- लीनियस ने द्विजगत पद्धति विकसित की: प्लांटी और ऐनिमेलिया।
- द्विजगत पद्धति में कोशिका संरचना और पोषण के आधार पर भेद संभव नहीं था।
- व्हिटेकर ने 1969 में पाँच जगत वर्गीकरण प्रस्तावित किया।
- पाँच जगत: मौनेरा, प्रोटिस्टा, फंजाई, प्लांटी और एनिमेलिया।
- 📌 वर्गीकरण: जीवों को उनके लक्षणों के आधार पर समूहों में बांटना।
- 📌 प्रोकैरियोटिक कोशिका: ऐसी कोशिका जिसमें केंद्रक की झिल्ली नहीं होती।
- 📌 यूकैरियोटिक कोशिका: ऐसी कोशिका जिसमें केंद्रक स्पष्ट रूप से उपस्थित होता है।
पाँच प्रमुख जगतों के लक्षण
व्याख्यापाँच प्रमुख जगतों के लक्षण
पाँच जगत वर्गीकरण में जीवों को उनके कोशिका प्रकार, कोशिका भित्ति, केंद्रक की उपस्थिति, काय संरचना, पोषण की विधि और प्रजनन की विधि के आधार पर पाँच प्रमुख जगतों में बांटा गया है। तालिका 2.1 में इन जगतों के प्रमुख लक्षणों का तुलनात्मक विवरण दिया गया है। मौनेरा जगत के जीव प्रोकैरियोटिक होते हैं, जिनकी कोशिका भित्ति सेल्युलोज रहित होती है और केंद्रक अनुपस्थित होता है। इनके पोषण में स्वपोषी (रसायन संश्लेषी एवं प्रकाश संश्लेषी) तथा परपोषी दोनों प्रकार होते हैं। प्रोटिस्टा जगत के जीव यूकैरियोटिक होते हैं, जिनमें केंद्रक उपस्थित होता है और कुछ में कोशिका भित्ति भी पाई जाती है। ये स्वपोषी तथा परपोषी दोनों हो सकते हैं। फंजाई जगत के जीव यूकैरियोटिक होते हैं, जिनकी कोशिका भित्ति काइटिन से बनी होती है और ये मुख्यतः परपोषी होते हैं। प्लांटी जगत के जीव यूकैरियोटिक, बहुकोशिकीय और स्वपोषी होते हैं, जिनकी कोशिका भित्ति सेल्युलोज से बनी होती है। एनिमेलिया जगत के जीव यूकैरियोटिक, बहुकोशिकीय और परपोषी होते हैं, जिनकी कोशिका भित्ति अनुपस्थित होती है। प्रजनन की विधि भी जगतों में भिन्न होती है, जैसे मौनेरा में संयुग्मन, प्रोटिस्टा में युग्मक संलयन एवं संयुग्मन, फंजाई, प्लांटी और एनिमेलिया में निषेचन होता है। यह वर्गीकरण जीवों के बीच समानताओं और भिन्नताओं को समझने में सहायक है। **Table on page 2 (8×6)** | लक्षण | पाँच जगत | | | | | | --- | --- | --- | --- | --- | --- | | | मौनेरा | प्रोटिस्टा | फंजाई | प्लांटी | एनिमेलिया | | कोशिका प्रकार | प्रोकैरियोटिक | यूकैरियोटिक | यूकैरियोटिक | यूकैरियोटिक | यूकैरियोटिक | | कोशिका भित्ति | सेल्युलोज रहित (बहुशार्कराइड) + एमीनो अम्ल | कुछ में उपस्थित | उपस्थित (सेल्युलोस रहित) काइटिन युक्त | उपस्थित (सेल्युलोस सहित) | अनुपस्थित | | केंद्रक (झिल्ली) | अनुपस्थित | उपस्थित | उपस्थित | उपस्थित | उपस्थित | | काय संरचना | कोशिकीय | कोशिकीय | बहुकोशिक/ अदृढ़ ऊतक | ऊतक/अंग ऊतकतंत्र | ऊतक/अंग/ अंग तंत्र | | पोषण की विधि | स्वपोषी (रसायन संश्लेषी एवं प्रकाशसंश्लेषी) तथा परपोषी (मृतपोषी एवं परजीवी) | स्वपोषी (प्रकाशसंश्लेषी) तथा परपोषी | परपोषी (मृतपोषी एवं परजीवी) | स्वपोषी (प्रकाशसंश्लेषी) | परपोषी (प्राणि समभोजी, मृतपोषी इत्यादि) | | प्रजनन की विधि | संयुग्मन | युग्मक संलयन एवं संयुग्मन | निषेचन | निषेचन | निषेचन |
- मौनेरा: प्रोकैरियोटिक, केंद्रक अनुपस्थित, स्वपोषी और परपोषी।
- प्रोटिस्टा: यूकैरियोटिक, केंद्रक उपस्थित, स्वपोषी और परपोषी।
- फंजाई: यूकैरियोटिक, कोशिका भित्ति काइटिनयुक्त, मुख्यतः परपोषी।
- प्लांटी: यूकैरियोटिक, बहुकोशिकीय, स्वपोषी, कोशिका भित्ति सेल्युलोजयुक्त।
- एनिमेलिया: यूकैरियोटिक, बहुकोशिकीय, परपोषी, कोशिका भित्ति अनुपस्थित।
- प्रजनन विधि में जगतों के बीच भिन्नता।
- 📌 कोशिका भित्ति: कोशिका के बाहर की संरचना जो कोशिका को आकार और सुरक्षा प्रदान करती है।
- 📌 संयुग्मन: दो जीवों के बीच आनुवंशिक पदार्थ का आदान-प्रदान।
- 📌 निषेचन: नर और मादा युग्मकों के संलयन द्वारा नए जीव का निर्माण।
मौनेरा जगत
व्याख्यामौनेरा जगत
मौनेरा जगत में वे सभी जीव आते हैं जिनकी कोशिका प्रोकैरियोटिक होती है, अर्थात् जिनमें केंद्रक की झिल्ली नहीं होती। ये जीव अत्यंत सूक्ष्म होते हैं और लगभग सभी स्थानों पर पाए जाते हैं, जैसे मिट्टी, जल, बर्फ, मरूस्थल, गर्म जल के झरने आदि। इनमें बैक्टीरिय
अभ्यास प्रश्न — जीव जगत का वर्गीकरण
NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित
Q1.क्रिसोफाइट्स डाइनोफ्लैगलेट्स से अलग होते हैं -
उत्तर:
ख़) कोशिका की दीवारें दो पतली अतिव्यापी गोले बनाती हैं
Q2.आर्कबैक्टीरिया में यूबैक्टेरिया से भिन्न होता है
उत्तर:
क) कोशिका की दीवार की संरचना
Q3.वर्गीकरण की पद्धतियों में समय के साथ आए परिवर्तनों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
वर्गीकरण की पद्धतियाँ समय के साथ विकसित हुई हैं क्योंकि जीवों के बारे में हमारी जानकारी बढ़ी है। प्रारंभ में जीवों को केवल उनके बाहरी लक्षणों के आधार पर वर्गीकृत किया जाता था। बाद में संरचनात्मक, आनुवंशिक, विकासात्मक और आणविक स्तर पर अध्ययन के आधार पर वर्गीकरण किया जाने लगा। आधुनिक वर्गीकरण में जीवों के डीएनए अनुक्रम, प्रोटीन संरचना और आनुवंशिक संबंधों को ध्यान में रखा जाता है। इस प्रकार, समय के साथ वर्गीकरण की पद्धतियाँ सरल से जटिल और अधिक वैज्ञानिक होती गईं।
व्याख्या:
प्रारंभिक वर्गीकरण केवल बाहरी लक्षणों पर आधारित था, जैसे कि कैरोलस लिनियस का वर्गीकरण। बाद में जीवों के आंतरिक लक्षण, विकासक्रम और आनुवंशिकी को शामिल किया गया। आधुनिक काल में आणविक जीवविज्ञान के आधार पर वर्गीकरण किया जाता है, जिससे जीवों के बीच के वास्तविक संबंधों का पता चलता है।
Q4.निम्नलिखित के बारे में आर्थिक दृष्टि से दो महत्वपूर्ण उपयोगों को लिखें: (क) परपोषी बैक्टीरिया (ख) आद्य बैक्टीरिया
उत्तर:
(क) परपोषी बैक्टीरिया के आर्थिक उपयोग: 1. ये मिट्टी में नाइट्रोजन को फिक्स करके पौधों के लिए उपयोगी बनाते हैं, जिससे कृषि उत्पादन बढ़ता है। 2. दही, पनीर, दही आदि दुग्ध उत्पादों के निर्माण में उपयोगी होते हैं। (ख) आद्य बैक्टीरिया के आर्थिक उपयोग: 1. ये किण्वन प्रक्रिया में सहायक होते हैं, जैसे शराब, सिरका, और एंटीबायोटिक्स के उत्पादन में। 2. जैव प्रौद्योगिकी में इनका उपयोग जैव ईंधन और औषधि निर्माण में किया जाता है।
व्याख्या:
परपोषी बैक्टीरिया जैसे नाइट्रोजन फिक्सिंग बैक्टीरिया मिट्टी की उर्वरता बढ़ाते हैं और खाद्य पदार्थों के उत्पादन में सहायक होते हैं। आद्य बैक्टीरिया किण्वन और औद्योगिक प्रक्रियाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
Q5.डाइएटम की कोशिका भित्ति के क्या लक्षण हैं?
उत्तर:
डाइएटम की कोशिका भित्ति सिलिका (SiO2) से बनी होती है, जो कठोर और कांच जैसी होती है। यह दो भागों में विभक्त होती है, जो एक-दूसरे के ऊपर फिट होते हैं। कोशिका भित्ति पर विभिन्न प्रकार के छिद्र और रेखाएं होती हैं, जो जल के प्रवाह और गैस विनिमय में सहायक होती हैं। यह भित्ति डाइएटम को संरचनात्मक मजबूती प्रदान करती है।
व्याख्या:
डाइएटम की कोशिका भित्ति सिलिका से बनी होने के कारण कठोर होती है, जो उन्हें संरक्षण देती है। इसकी दो भागों वाली संरचना से कोशिका की वृद्धि और विभाजन संभव होता है। छिद्रों के माध्यम से आवश्यक पदार्थों का आवागमन होता है।
Q6.‘शैवाल पुष्पन’ (Algal Bloom) तथा ‘लाल तरंगें’ (red-tides) क्या दर्शाती हैं।
उत्तर:
शैवाल पुष्पन (Algal Bloom) जल में शैवालों की अत्यधिक वृद्धि को दर्शाता है, जो जल में पोषक तत्वों की अधिकता के कारण होता है। यह जल की गुणवत्ता को प्रभावित करता है और मछलियों सहित अन्य जलजीवों के लिए हानिकारक होता है। लाल तरंगें (red-tides) समुद्री जल में कुछ प्रकार के शैवालों की अत्यधिक वृद्धि को कहते हैं, जिनसे जल लाल रंग का हो जाता है। ये शैवाल विषैले पदार्थ छोड़ते हैं, जो समुद्री जीवों और मनुष्यों के लिए हानिकारक होते हैं।
व्याख्या:
शैवाल पुष्पन और लाल तरंगें दोनों ही जल में पोषक तत्वों की अधिकता और पर्यावरणीय असंतुलन के कारण होते हैं। ये जलजीवों के लिए विषैले वातावरण बनाते हैं और जल प्रदूषण का संकेत हैं।
Q7.वाइरस से विरोइड कैसे भिन्न होते हैं?
उत्तर:
वाइरस और विरोइड में मुख्य अंतर निम्नलिखित हैं: 1. वाइरस में प्रोटीन की कोटिंग (कैप्सिड) होती है, जबकि विरोइड में केवल एकल-स्ट्रैंड RNA होता है और कोई प्रोटीन कोटिंग नहीं होती। 2. वाइरस विभिन्न प्रकार के जीवों (पादप, पशु, जीवाणु) को संक्रमित कर सकते हैं, जबकि विरोइड केवल पौधों को संक्रमित करते हैं। 3. वाइरस में डीएनए या आरएनए हो सकता है, जबकि विरोइड में केवल RNA होता है। 4. विरोइड आकार में बहुत छोटे होते हैं और केवल RNA अणु होते हैं, जबकि वाइरस अधिक जटिल संरचना वाले होते हैं।
व्याख्या:
वाइरस और विरोइड दोनों रोगजनक होते हैं, लेकिन विरोइड बहुत सरल होते हैं और केवल RNA होते हैं। वाइरस में प्रोटीन कोटिंग होती है जो उन्हें संरक्षित करती है। विरोइड पौधों में रोग उत्पन्न करते हैं जबकि वाइरस विभिन्न जीवों में।
Q8.प्रोटोजोआ के चार प्रमुख समूहों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
प्रोटोजोआ के चार प्रमुख समूह हैं: 1. सिस्टोडिना (Ciliophora): इनमें शरीर पर छोटे-छोटे बाल (सिलिया) होते हैं, जो चलने और भोजन लेने में मदद करते हैं। उदाहरण: पैरामिसियम। 2. झिल्लीधारी (Flagellata): इनमें एक या अधिक झिल्ली (flagella) होते हैं, जो तैरने में सहायक होते हैं। उदाहरण: युग्लेना। 3. राइज़ोपोडिया (Rhizopoda): ये अमीबा जैसे होते हैं, जो पैरापोडिया (false feet) के माध्यम से चलते हैं। उदाहरण: अमीबा। 4. स्पोरोज़ोआ (Sporozoa): ये स्थिर होते हैं और परजीवी होते हैं, जैसे प्लाज्मोडियम जो मलेरिया का कारण है।
व्याख्या:
प्रोटोजोआ एककोशिकीय जीव होते हैं, जो विभिन्न प्रकार के चलने के अंगों के आधार पर वर्गीकृत होते हैं। प्रत्येक समूह की विशेषताएं और जीवन चक्र अलग होते हैं।
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Biology · Class 11
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