स मे प्रियः: संस्कृत पाठ का अर्थ और महत्व | कक्षा 11 NCERT
द्वारा MyStudyCoach Team · प्रकाशित 2 जुलाई 2026 · 4 मिनट का पठन

स मे प्रियः संस्कृत पाठ भगवान श्रीकृष्ण के भक्तियोग के गुणों को सरल भाषा में समझाता है। कक्षा 11 के छात्र इस पाठ के श्लोकों और उनके भावार्थ को जानकर योग और भक्ति के महत्व को समझ सकते हैं।
स मे प्रियः पाठ का परिचय
स मे प्रियः संस्कृत पाठ भगवान श्रीकृष्ण के भक्तियोग के उपदेशों का सार प्रस्तुत करता है। इसमें बताया गया है कि जो मन, बुद्धि और इन्द्रियों को संयमित कर ईश्वर में लीन रहता है, वही भगवान को प्रिय होता है। यह पाठ कक्षा 11 के NCERT संस्कृत पुस्तक का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। पाठ में योगी के गुण जैसे अद्वेष्टा (द्वेष रहित), मैत्रि (मित्रता), करुणा (दया), क्षमा, संतोष, और समता का वर्णन है। ये गुण भक्त के चरित्र को दर्शाते हैं जो ईश्वर को प्रिय होते हैं।
स मे प्रियः के प्रमुख संस्कृत श्लोक और उनका भावार्थ
इस पाठ के प्रमुख श्लोक निम्नलिखित हैं:
- सम: शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयो:
इसका अर्थ है कि योगी शत्रु और मित्र में समान भाव रखता है और मान-अपमान को भी समान समझता है।
- मयेव मन आधल्स्व मयि बुद्धिं निवेशय:
इसका अर्थ है कि मन और बुद्धि को केवल भगवान में लगाओ।
- यो न ह्ययति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति:
यह योगी है जो न तो किसी से द्वेष करता है, न शोक करता है, न इच्छा रखता है।
इन श्लोकों से ज्ञात होता है कि समभाव, अहंकार रहितता और संयमित मन योगी के गुण हैं।
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योगी के गुण: ईश्वर को प्रिय कौन से गुण हैं?
ईश्वर को प्रिय होने के लिए निम्नलिखित गुण आवश्यक हैं:
- अद्वेष्टा: द्वेष रहित होना।
- मैत्रि: सभी के प्रति मित्रता भाव।
- करुणा: दया और परोपकार।
- निर्ममत्व: ममता का त्याग।
- निरहंकार: अहंकार रहित होना।
- क्षमा: दूसरों को क्षमा करना।
- संतोष: जीवन में संतुष्ट रहना।
- दृढ़निश्चय: अपने लक्ष्य के प्रति दृढ़ निश्चय।
- अनपेक्षता: फल की चिंता न करना।
- समता: सुख-दुख में समान भाव रखना।
ये गुण भक्त के चरित्र को निर्मल बनाते हैं और ईश्वर को प्रिय बनाते हैं।
कर्म और समभाव का महत्व
स मे प्रियः पाठ में बताया गया है कि योगी कर्मों के फल की चिंता नहीं करता। वह समभाव से सभी कर्म करता है। इसका अर्थ है:
- कर्म करते समय फल की इच्छा न रखना।
- सभी प्राणियों के हित में कार्य करना।
- सुख-दुख, लाभ-हानि में समान भाव रखना।
यह समभाव योगी को मानसिक शांति देता है और ईश्वर के निकट ले जाता है।
| कर्म की भावना | योगी का दृष्टिकोण |
|---|---|
| फल की इच्छा | फल त्याग कर कर्म करना |
| स्वार्थ | सभी के हित में कर्म करना |
| मनोदशा | समभाव और संतोष रखना |
स मे प्रियः पाठ का अभ्यास कैसे करें?
कक्षा 11 के छात्र निम्नलिखित तरीके से इस पाठ का अभ्यास कर सकते हैं:
- संस्कृत श्लोकों का सही उच्चारण करें।
- प्रत्येक श्लोक का भावार्थ समझें।
- योगी के गुणों को अपने जीवन में अपनाने का प्रयास करें।
- अध्याय के प्रश्नों का उत्तर लिखकर अभ्यास करें।
- श्लोकों के अर्थ को याद करें और परीक्षा में लिखने का अभ्यास करें।
इस प्रकार का अभ्यास NCERT पाठ को गहराई से समझने में मदद करता है।
स मे प्रियः पाठ से जुड़ी महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तरी
यहाँ कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न और उनके उत्तर दिए गए हैं जो परीक्षा में मददगार होंगे:
- प्रश्न: योगी के कौन-कौन से गुण ईश्वर को प्रिय होते हैं?
उत्तर: अद्वेष्टा, मैत्रि, करुणा, क्षमा, संतोष, निरहंकार, समता।
- प्रश्न: समभाव का अर्थ क्या है?
उत्तर: सुख-दुख, मित्र-शत्रु में समान भाव रखना।
- प्रश्न: योगी कर्मों का फल क्यों नहीं चाहता?
उत्तर: वह फल की चिंता त्याग कर समभाव से कर्म करता है।
- प्रश्न: अभ्यास में असमर्थ व्यक्ति क्या करे?
उत्तर: धैर्यपूर्वक पुनः प्रयास करे और सत्य के मार्ग पर दृढ़ रहे।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
स मे प्रियः पाठ का मुख्य विषय क्या है?
यह पाठ भक्तियोग के गुणों और योगी के चरित्र को दर्शाता है जो ईश्वर को प्रिय होते हैं।
योगी के कौन से गुण ईश्वर को प्रिय होते हैं?
अद्वेष्टा, मैत्रि, करुणा, क्षमा, संतोष, निरहंकार, समता आदि गुण।
स मे प्रियः पाठ में समभाव का क्या अर्थ है?
सुख-दुख, मित्र-शत्रु, मान-अपमान में समान भाव रखना समभाव है।
अभ्यास में असमर्थ व्यक्ति को क्या करना चाहिए?
धैर्यपूर्वक पुनः प्रयास करना चाहिए और सत्य के मार्ग पर दृढ़ रहना चाहिए।
कर्मफल त्याग का क्या महत्व है?
यह योगी को मानसिक शांति देता है और ईश्वर के निकट ले जाता है।
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