प्रत्यावर्ती धारा: कक्षा 12 के लिए सम्पूर्ण परिचय और सिद्धांत
द्वारा MyStudyCoach Team · प्रकाशित 2 जुलाई 2026 · 4 मिनट का पठन

प्रत्यावर्ती धारा (AC) में धारा और वोल्टता समय के साथ आवर्ती रूप से बदलते हैं। कक्षा 12 के भौतिकी के इस अध्याय में हम प्रेरक, संधारित्र और मिश्रित परिपथों में प्रत्यावर्ती धारा के व्यवहार को विस्तार से समझेंगे।
प्रत्यावर्ती धारा क्या है?
प्रत्यावर्ती धारा (Alternating Current - AC) वह धारा है जो समय के साथ आवर्ती रूप से दिशा और परिमाण बदलती रहती है। भारत में मुख्य विद्युत आपूर्ति AC होती है, जिसकी आवृत्ति 50 Hz है। AC के कारण उपकरणों में ऊर्जा की आपूर्ति आसान और सुरक्षित होती है। कक्षा 12 के भौतिकी में प्रत्यावर्ती धारा के सिद्धांतों को समझना महत्वपूर्ण है क्योंकि यह विद्युत परिपथों की व्यवहार्यता को स्पष्ट करता है।
- AC में धारा और वोल्टता दोनों समय के साथ साइन वेव की तरह बदलते हैं।
- इसका मान अधिकतम (peak), RMS और औसत मानों में मापा जाता है।
यह अध्याय प्रेरक, संधारित्र और मिश्रित परिपथों में AC के प्रभावों को समझाता है।
प्रेरक (Inductor) में प्रत्यावर्ती धारा का व्यवहार
प्रेरक एक ऐसा अवयव है जो चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करता है जब धारा इसके माध्यम से प्रवाहित होती है। AC परिपथ में प्रेरक की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
- प्रेरक में धारा वोल्टता से 90° पीछे रहती है। इसका अर्थ है कि वोल्टता चरम पर होती है जबकि धारा शून्य होती है।
- प्रेरक की प्रेरणिक प्रतिबाधा $X_L = \omega L$ होती है, जहाँ $\omega = 2\pi f$ आवृत्ति है और $L$ प्रेरकत्व है।
उदाहरण:
यदि $L = 0.1 H$ और आवृत्ति $f = 50 Hz$ है, तो
$$X_L = 2\pi \times 50 \times 0.1 = 31.4 \ \Omega$$
इसका अर्थ है कि प्रेरक पर प्रतिबाधा 31.4 ओम होगी।
इस प्रतिबाधा के कारण प्रेरक में धारा की देरी होती है, जो AC परिपथों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
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संधारित्र (Capacitor) में प्रत्यावर्ती धारा का व्यवहार
संधारित्र एक ऐसा अवयव है जो विद्युत आवेश को संग्रहित करता है। AC परिपथ में संधारित्र की विशेषताएँ इस प्रकार हैं:
- संधारित्र में धारा वोल्टता से 90° आगे रहती है। अर्थात् धारा चरम पर होती है जबकि वोल्टता शून्य होती है।
- संधारित्र की धारितात्मक प्रतिबाधा $X_C = \frac{1}{\omega C}$ होती है, जहाँ $C$ धारिता है।
उदाहरण:
यदि $C = 10 \mu F$ और आवृत्ति $f = 50 Hz$ है, तो
$$X_C = \frac{1}{2\pi \times 50 \times 10 \times 10^{-6}} = 318.3 \ \Omega$$
इससे पता चलता है कि संधारित्र पर प्रतिबाधा आवृत्ति के साथ घटती है।
मिश्रित LCR परिपथ में प्रत्यावर्ती धारा
LCR परिपथ में प्रतिरोधक (R), प्रेरक (L) और संधारित्र (C) एक साथ जुड़े होते हैं। इस परिपथ में कुल प्रतिबाधा और धारा- वोल्टता के बीच चरण संबंध महत्वपूर्ण होते हैं।
- कुल प्रतिबाधा:
$$Z = \sqrt{R^2 + (X_L - X_C)^2}$$
- चरण कोण:
$$\phi = \tan^{-1} \left( \frac{X_L - X_C}{R} \right)$$
यह कोण धारा और वोल्टता के बीच के चरण अंतर को दर्शाता है।
| अवयव | प्रतिबाधा | चरण संबंध |
|---|---|---|
| R | $R$ | 0° (फेज में) |
| L | $X_L$ | -90° (धारा पीछे) |
| C | $X_C$ | +90° (धारा आगे) |
इस परिपथ में शक्ति गुणांक $\cos \phi$ परिपथ की दक्षता को दर्शाता है।
प्रत्यावर्ती धारा के महत्वपूर्ण सूत्र और उदाहरण
प्रत्यावर्ती धारा के अध्ययन में निम्नलिखित सूत्र महत्वपूर्ण हैं:
- प्रेरणिक प्रतिबाधा: $X_L = \omega L$
- धारितात्मक प्रतिबाधा: $X_C = \frac{1}{\omega C}$
- कुल प्रतिबाधा: $Z = \sqrt{R^2 + (X_L - X_C)^2}$
- चरण कोण: $\phi = \tan^{-1} \frac{X_L - X_C}{R}$
उदाहरण:
एक LCR श्रृंखला परिपथ में $R=10 \ \Omega$, $L=0.2 H$, $C=50 \mu F$, और आवृत्ति $f=50 Hz$ है। कुल प्रतिबाधा और चरण कोण ज्ञात करें।
- $\omega = 2\pi \times 50 = 314.16$ rad/s
- $X_L = 314.16 \times 0.2 = 62.83 \ \Omega$
- $X_C = \frac{1}{314.16 \times 50 \times 10^{-6}} = 63.66 \ \Omega$
- $Z = \sqrt{10^2 + (62.83 - 63.66)^2} = \sqrt{100 + 0.69^2} \approx 10.02 \ \Omega$
- $\phi = \tan^{-1} \frac{62.83 - 63.66}{10} = \tan^{-1} (-0.083) = -4.75^\circ$
इसका अर्थ है कि धारा वोल्टता से लगभग 4.75° आगे है।
प्रत्यावर्ती धारा के प्रयोग और महत्व
प्रत्यावर्ती धारा का उपयोग विद्युत ऊर्जा के वितरण में व्यापक रूप से होता है। इसके मुख्य लाभ हैं:
- लंबी दूरी तक ऊर्जा का कम नुकसान
- ट्रांसफार्मर के माध्यम से वोल्टेज को आसानी से बढ़ाना या घटाना
- विभिन्न विद्युत उपकरणों में उपयोगी
कक्षा 12 के छात्रों के लिए प्रत्यावर्ती धारा की समझ से वे विद्युत परिपथों, ट्रांसफार्मर, और विद्युत ऊर्जा वितरण की गहरी समझ प्राप्त कर सकते हैं।
यह विषय NCERT और CBSE के पाठ्यक्रम में महत्वपूर्ण है और परीक्षाओं में अक्सर प्रश्न पूछे जाते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रेरक में धारा और वोल्टता के बीच कोण कितना होता है?
प्रेरक में धारा वोल्टता से 90° पीछे रहती है।
संधारित्र की धारितात्मक प्रतिबाधा का सूत्र क्या है?
संधारित्र की धारितात्मक प्रतिबाधा $X_C = \frac{1}{\omega C}$ होती है।
LCR परिपथ में कुल प्रतिबाधा कैसे निकाली जाती है?
कुल प्रतिबाधा $Z = \sqrt{R^2 + (X_L - X_C)^2}$ होती है।
प्रत्यावर्ती धारा में शक्ति गुणांक क्या दर्शाता है?
शक्ति गुणांक परिपथ की दक्षता और धारा- वोल्टता के चरण संबंध को दर्शाता है।
AC परिपथ में संधारित्र पर धारा वोल्टता से कैसे रहती है?
संधारित्र में धारा वोल्टता से 90° आगे रहती है।
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